शनिवार, 3 सितंबर 2011

पर्दा गिरा है

हमारा पर्दा गिरा है

कल तक बे पर्दा थे

कुछ परदे बागी हो चले है

वों दूसरों के आगन में सेंध लगा आये

सबने हाथ पकड़ा फिर भी एक छिटक गया

न जाने कहा से कुछ धब्बे साथ ले आया

उसे मारा-पीटा वों टस से मस ना हुआ

गरम था खून उसका

कई रंगों में रंग चूका था

फिर से पकड़कर धोया तो

सतरंगी बन चला था

वों बरदारी का ना रहा अब

चितकबरा सा लगने लगा

लोग उससे कतराने लगे

वों चीखा किसी उसकी ना सूनी

सब के आगे परदे लगे थे

कल तक वों हमारा हिस्सा था

आज अजानक पड़ोसी हो चला

एक मूक सन्नाटा सा पसरा है

हम सब पर्द हो चले है

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