हनी और में
उसकी काच की चूडियाँ हनी से अक्सर चिपक जाती थीं
वो हमेशा मुझे अपना हनी दूर रखने को कहती
में भुलक्कड़,आलसी सब कुछ बदलता पर हनी की जगह नहीं
एक लगाव सा हो गया था मुझे,अब तो लगने लगा
हनी और में सदा के लिए...
मुधुमक्खी से आज भी डरता हु
काट जाती है तो काफी दर्द होता है
स्नेहा जब भी गुस्साती है तो,
कमरे के बाहर खीले सूरजमुखी के पास जाकर बैठ जाता हु
प्रकर्तिक मधु रस भी कभी – कभी अच्छा लगता है
कुछ देर बाद कमरे में सन्नाटा देख चोकता
रोज का यह खेल रहता बड़ा विचित्र
उसे लगता एक स्पेस हो गयी है हमारे बीच
हनी और में सदा के लिए...
अभी कल ही उसकी पीली सलवार पर हनी गीर गया
मारेगी शायद इसी डर से रात बाहर रहा
हलकी बारिश में चाय की चुस्की ले रहा हूँ
अचानक उठा हनी की बोतल लेने गया
कई सारे क्रेक हाथ लगे बोतल पर
सुबह-शाम दो बार घर की बेल बजाता हू
एक बार मेरे लिए दूसरी बार स्नेहा के लिए
मुधुमक्खी काटने पर दर्द नहीं होता
अब तो हमेशा के लिए
हनी और में सदा के लिए...